Tuesday, May 29, 2012

शब्द समर्पण 



 एक महीने पहले फेसबुक पर ख़ुद को एक और नए ग्रुप में जुड़ा हुआ पाया .....नाम था 'फरगुदिया ...स्त्री के अंतर्मन में उठे प्रश्न और समाधान ' नाम थोड़ा अलग सा था .....मैंने ग्रुप का पेज ओपन किया फिर उसके बनाये जाने के मकसद पर मेरा ध्यान गया .......मुझे पता चला कि ये ग्रुप दिल्ली की रहने वाली एक साधारण सी ग्रहणी जिनका नाम 'शोभा मिश्रा 'है , उनका है जिन्होंने अपनी बचपन की मित्र जिसका नाम 'फरगुदिया 'था उसकी याद में बनाया है...... मात्र १४ वर्ष की उम्र की थी फरगुदिया जब वह किसी की दरिंदगी का शिकार हुई और जब गरीब, बेसहारा और एक गाँव में घरों में काम-काज कर अपने परिवार का पालन-पोषण करने वाली उसकी माँ ने उसका गर्भपात करवाया तो उसकी मौत हो गई.............संवेदनाओं को समर्पित इस ग्रुप से और शोभा दीदी से लगाव कुछ बढ़ गया था ...फोन से भी बातचीत होने लगी इस बीच एक कर्यक्रम के लिए उनका फोन मेरे पास आया ...उनका मन था कि  उसी फरगुदिया और उसकी जैसी हज़ारों-लाखों-करोड़ों फरगुदियाओं की याद में एक शाम रखी जाये  जिसमें कुछ कवयित्रियाँ इस तरह की कुकृत्यों के विरोध में अपनी कविताओं का पाठ करें ...मैंने हामी तो भर दी लेकिन मन में कई बार ये प्रश्न भी आया कि सिर्फ़ कवितायेँ या सिर्फ़ एक मौखिक क्रांति से समाज में कुछ बदलाव आ पायेगा ?

फिर सोचा मानवीय संवेदनाओं के निम्नतर स्तर की उपज हैं ये घटनाएँ ......और इन्हें उच्चतर बनने की क्रिया एक सतत प्रक्रिया है ...........इसके लिए प्रयास होता रहे चाहे वो लिखने और पढ़ने  से ही क्यों ना हो ..तो लगा ये ज्यादा अच्छा  है .... कुछ ना होने से बहुत  बेहतर ...........


 ख़ैर कार्यक्रम हुआ और सफल भी हुआ ....... 'फरागुदिया के नाम-एक शाम' कहने के लिए 'फरगुदिया' के नाम पर एक कविता पाठ का कार्यक्रम था. लेकिन कविताओं के अलावा वहाँ बहुत कुछ और भी था जिसने उपस्थित श्रोताओं के मन को छुआ. सबसे पहले दीप-प्रज्वलन एक ऐसी महिला से जिनका ज़िक्र हाशिए में भी नहीं होता. घरों में काम-काज कर अपने सात बच्चों के परिवार का पालन-पोषण और अपनी बच्चियों को अच्छी शिक्षा देने का सपना रखने वाली विधवा अनारा देवी ने कार्यक्रम अध्यक्षा सविता सिंह जी और मुख्य अतिथि सुमन केशरी जी के साथ दीप प्रज्वलन किया...कैसर जैसी घातक बीमारी को अपनी जिजीविषा से परास्त कर बहुत सारे लोगों के लिए उम्मीद की किरण बनीं मंजु दीक्षित जी का सम्मान .......वरिष्ठ साहित्यकार नन्द भारद्वाज जी ,पुरुषोत्तम अग्रवाल जी एवं हरीश नवल जी की गरिमा पूर्ण उपस्तिथि ने कार्यक्रम  को और गरिमा प्रदान की वरिष्ठ कवयित्रियों सविता सिंह जी , सुमन केसरी जी , स्नेह सुधा नवल जी के साथ साथ लीना मल्होत्रा राव , अंजू शर्मा ,  , विपिन चौधरी , रश्मि भारद्वाज , निरुपमा सिंह , स्वाति ठाकुर  के काव्य पाठ ने कार्यक्रम एक सार्थक आयाम दिया ....... कवि और समाज सेवी प्रेम भारद्वाज जी ,डॉ गीता सिंह भी कार्यक्रम में मौजूद थे | मुकेश मानस जी , भरत तिवारी जी , राघवेन्द्र अवस्थी जी , रविन्द्र के दास जी , स्वतंत्र भारत , सुबोध कुमार जी , रूपा सिंह , स्नेह देसाई , धीरज कुमार , नरेन्द्र कुमार , रोहित कुमार , भास्कर ठाकुर , सुशील , महेश दीक्षित जी , मंजू दीक्षित जी , चंद्रकांता , सखी समूह की सह संचालिका अरुणा सक्सेना भी माजूद थीं ...................सईद अयूब ने कार्यक्रम सफल बनाने  में शोभा जी की पूरी मदद की ....

एक नया अनुभव था मेरे लिए ...एक तो फेसबुक के बहुत सारे  मित्रों से फेस टू फेस मिलना और दूसरा एक ऐसे कार्यक्रम में जाना जो संवेदनाओं की उपज है ................कार्यक्रम की कुछ झलकियाँ इन पिक्चर्स में ......





मेरी सुनाई हुई दो कविताओं में से एक कविता जो 'फरगुदिया' को और उस जैसी ही अनेकों बच्चियों को समर्पित है 


 तुमने ले ही लिया था
जन्म
कि तुम्हे लेना था
लोरियाँ ,थपकियाँ नहीं थीं तुम्हरे लिए
मगर तुम थी तो छोटी सी बच्ची ही ना
सो ही जाती थीं पैरों ,हाथों ,को पेट से लगा के
बढ़ने लगी थीं तुम
कि तुम्हे बढ़ना ही था
रोटियां बस खाने को नहीं थीं तुम्हारे लिए
दिन भर के काम का मेहनताना था तुम्हारा
जो ईधन देता रहे तुम्हारी अंतडियों को
तुम रजस्वला हो गयी थीं
कि तुम्हे होना ही था
अब तुम कुम्हार की चाकी पर चढ़ ही गयी थीं
पकने कि लिए
तुम्हारे उभरते बदलाव चमकने लगे थे निगाहों में बहुतों के
अचानक तुम तोड़ दी गयीं
लेकिन तुम्हे टूटना नहीं था
कच्चे गीले बर्तन से भी कोई पानी पी गया
और चाक से गिर कर तुम बिखर गयीं ऐसे चक्रव्यूह में
जिसे भेदना तुमने भी सीखा ना था .....
तुम्हे बहुत कुछ होना था
मगर तुम हो ना पायीं
तुम पवित्र थीं गिरजे के घंटे की मुंदरी की तरह
 हैवानियत ने छुआ तुम्हे
तुम बजीं भी मगर एक चीख की तरह,
महकना था तुम्हे सुगंध की तरह
तुम बिखर गयीं भस्म की तरह,
खेलना था तुम्हे बच्चों की तरह
मगर तुम खेली गयीं खिलौनों की तरह,
तुम्हे कहना था बहुत कुछ
मगर तुम कह ना पायीं
‘बच्ची’ से ‘स्त्री’ बनने तक
तुम हो ही जातीं
तीखी ,कसैली ,पैनी
इस समाज की बदौलत
आक्रोश का लावा धधकता रहा होगा तुम्हारे अंदर तब तक
जब तक तुम्हारी चिता की सुलगती लकड़ियों ने उसे ठंडा ना कर दिया होगा
क्या अग्नि ही काट थी तुम्हारी अग्नि की ? 

Wednesday, May 16, 2012

कुछ यादें आपके साथ ..........


आज पापा की सातवीं पुण्यतिथि है ना जाने कितनी बार सोचा कि ये दिन अगर कलेंडर से मिट जाये तो कितना अच्छा हो या क्यों ना वो पल जब उनकी साँसें थमी थी वो पल वक़्त की अल्मारिओं में रखे हुए पलों के हिसाब से मिट जाये ......जानती हूँ ऐसा कभी भी नहीं होगा ...............इसीलिए ये बचपना भी  दोहराना  छोड़ दिया है |


 हम जल्दी ही उनके नाम का एक पेज बना रहे हैं 'डॉ-उर्मिलेश '.....जिसमें हम उनके कुछ वीडियोज,फोटोस ,कवितायेँ ,संस्मरण ताजा करेंगे ......हालाँकिहम कुछ ही वीडियोज एकत्र कर पायें हैं फिर भी कोशिश रहेगी कि उनसे जुड़े हर छुए अनछुए पहलुओं से हम आपको मिलवा सकें ,और जल्दी ही उनकी बेबसाइट भी आपके सामने होगी ......


पिछले एक दशक से जिस तरह तकनीक के द्वारा ,सोशल साइट्स के द्वारा  लेखकों और कवियों का पाठकों से सीधा साक्षात्कार होता दिखता है उसे देख कर मेरा भी मन होता है कि हम  भी पापा के कृतित्व और व्यक्तिव को आने वाली पीढ़ी तक ले के जायें ... मैं जानती हूँ कि उनको सुनने वाले श्रोता,उनको पढ़ने वाले उनके पाठक लाखों में हैं फिर भी ये साहित्यिक सिलसिला यहाँ भी जारी रहे ऐसी कामना है  ......


हाँ ये हमारा सौभाग्य ही है कि ‘महात्मा ज्योतिबाफूले रूहेलखंड विश्वविघ्यालय’ के बी.ए. के छात्र-छात्राएँ उन्हें कोर्स में पढ़ रहे हैं ....


इसी कड़ी में मैं आज आप सब के साथ एक वीडियो आज शेयर कर रही हूँ जो दिल्ली दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रम ‘पत्रिका’ का है इस कार्यक्रम में प्रख्यात गीतकार आदरणीय डॉ.कुंअर बैचैन जी ,मेरठ विश्वविद्यालय से  डॉ.नवीन सिंह लोहिनी जी ,प्रख्यात साहित्यकार डॉ.सुशील सिद्धार्थ जी ने पापा के सृजन और व्यक्तिव पर अपने विचार एवं उनसे जुड़े संस्मरण साझा किये हैं साथ ही उनकी कुछ गजलों का मैंने भी सस्वर पाठ किया है .........


आप सब भी अगर देखेंगे सुनेंगे तो मुझे भी अच्छा लगेगा ..........

Sunday, May 06, 2012

सत्यमेव जयते


आज आमिर खान का बहुप्रचारित एवं बहुप्रतीक्षित शो सत्यमेव जयते एयर हो गया, नाम से ही जाहिर है कि जैसा भी होगा समाज के लिए एक और नई दिशा से जोड़ेगा ......आज सुबह से कुछ मन अनमना सा था ,कभी-कभी सब कुछ सामान्य होते हुए भी ना जाने क्यों उदासीनता घर सी कर जाती है ......फिर भी ११ बजते ही मैं टी.वी. सेट के सामने बैठ गयी |आमिर खान का पहला शो एयर होने वाला था ..उनसे एक आम और ख़ास दोनों ही तरह के दर्शकों को एक ख़ास उम्मीद तो रहती ही है ,पहला एपिसोड ‘कन्या भ्रूण हत्या’ पर आधारित था और एपिसोड पर आने वाली महिलाएं,जिन्हें ना जाने कितनी भयानक यातनाओं से गुजरना पड़ा क्यों कि उन्होंने लड़की जन्मी थी या जन्मने वाली थीं .....गरीब तबके से लेकर पढ़े लिखे तबके से बुलाई गयीं भुक्तभोगी महिलाओं की दर्दनाक दास्तान सुनकर अभी भी मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं , ये शो पूरी तरह से अप टू द मार्क है पहले समस्या,फिर कारण,फिर निराकरण भी |

ऐसी ही दर्दनाक दास्तानों से हम सब भी रोज रूबरू होते हैं, सुबह आँख खुलते ही अख़बार दस्तक देता है अपनी ५ परसेंट अच्छी ख़बरें एवं ९९ परसेंट ऐसी ही दर्दनाक दास्तान लेकर और हम चेतना शून्य समाज के एक हिस्से की तरह पढ़ते हैं ,पलटते हैं और रद्दी में रख देते हैं .... मीना कुमारी का एक शेर है........
....
‘साहिल के तमाशाई ,हर डूबने वाले पर
अफ़सोस तो करते हैं इमदाद नहीं करते’


हम भी कुछ ऐसे ही तमाशाई से बने नजर आते हैं ,रोज सुबह फिर दिन चढ़ते- चढ़ते ना जाने कितनी बार..... और करें भी क्या ?
क्या हम भी जुटें एक जाग्रत नागरिक होने और समाज के एक अंग होने की जिम्मेदारी समझ कर ? लेकिन सवाल ये है कि अगर जुट भी जाएँ तो कौन सुनेगा ?........मेरे आसपास भी ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने जानते बूझते कोख में ही बेटियों को मार दिया और मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पाई .........
  

 आज ये सब मैं एक शब्द से विचलित होकर लिख रही हूँ वो है ‘चेतना शून्यता’ ...कल ‘हिंदुस्तान’ में ‘मोहन श्रोतिय’ जी का एक आलेख पढ़ा था जो उनके ब्लॉग ‘सोची समझी’ से उद्घृत है जहाँ उन्होंने मीना कुमारी के इसी शेर से अपनी पोस्ट का ताना बना बुना है जो मैंने अभी ऊपर लिखा है .....

 तभी से खुद से कई सवाल कर रही हूँ फिर खुद ही जबाव भी दे रही हूँ क्यों कि उसी चेतना शून्य समाज का एक उदाहरण मैं भी और आप भी और शायद हम में से ज्यादातर सभी हैं , जिनके लिए एक लाइन ‘क्या कर सकते हैं हम’ पर्याप्त है खुद को समस्याओं से बचा कर रखने की ...एक सच ये भी है कि अपनी परेशानियों की लिस्ट इतनी लंबी है कि कोई और साथ निभाए ना निभाए आखिरी साँस तक परेशानियाँ,व्यस्तताएं,जिम्मेदारियां हमारा पूरा साथ निभाती हैं




ओह......देख लीजिए मेरा इतना ही लिखना ‘हमारी समाज के प्रति जिम्मेदारी’ से बचकर निकल जाने का एक और बहाना है ........लेकिन मेरे साथ एक सच ये भी है कि जब कभी मैंने अपनी चैतन्यता का उपयोग किसी सद्कर्म में किया तो आधे से ज्यादा बार मेरे द्वारा किये गए ऐसे कार्य का सही जगह क्रियान्वन नहीं हो पाया शायद मेरी जल्दबाज़ी रही खुद को आगे से आगे रखने की जहाँ मैं कुछ सार्थक करके अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर सकूँ भले ही वो बाद में निरर्थक साबित हुआ हो .......समय के साथ और अनुभव के बाद हम बहुत कुछ सीखते हैं मैंने भी सीखा है और सीखूंगी भी .........आइये हम सब कोशिश करें और कोशिश ही नहीं पूरी लगन से अपनी जीवन के उस प्रश्न का समाधान करें जहाँ हमें उत्तर मिले कि ‘असल जीवन तो ये है जहाँ हम ‘मैं’ से ऊपर उठकर ‘हम’ को पहचान पायें!

 मैं बधाई देती हूँ  ‘सत्यमेव जयते’ की पूरी टीम को जिनका प्रथम प्रयास निसंदेह प्रशंसनीय है !मैं पुनः कहना चाहती हूँ कि इस कार्यक्रम में समस्या भी थी कारण भी थे और निराकरण भी जिसने इसे सम्पूर्ण बनाया है .........हमेशा साथ दीजिए ऐसे प्रयास का ...............’सत्यमेव जयते’!



Friday, April 13, 2012

ग़ज़ल

गभग पन्द्रह दिन पहले दिल्ली से वापस लौटते समय FM पर मेरा बहुत ही पसंदीदा गाना 'रोज रोज आंखों तले इक ही सपना पले रात भर काजल जले आँखों में जिस तरह ख़्वाब का दिया जले 'बज रहा था ........ ख़्वाब, रात ,नींद , ख़्वाहिशें,उम्मीदें ये कविता,ग़ज़ल में सबसे ज्यादा लिखे जाने वाले लफ़्ज हैं ,ऐसा मुझे लगता है और हो भी क्यों न  ज़िंदगी भी इन्ही लफ्जों के इर्द गिर्द घूमती रहती है ..... ख़ैर गाना सुनते सुनते इक  दो लाइन मेरे जेहन में भी आयीं 'बंद आँखों से जहाँ मुझको समंदर सा लगा /जागी आँखों से वहां रास्ता बंजर सा लगा  ...........Mobile note book ने इस बार भी ख़ुद पर मेरे ज़ज्बात को लिखने  में और हाँ भूल न जाने में अपनी मदद दी .........आज जैसे तैसे इस  ग़ज़ल को पूरा करने की कोशिश की है .........अब तक कोशिशे ही चल रही हैं क्यों कि लिखने की 'क़ाबिलियत' यकीनन अब भी मुझमे नहीं है ...हाँ मन का कहा मानकर कोशिशें बदस्तूर जारी हैं ......

बंद आँखों से जहाँ मुझको समंदर सा लगा 
जागी आँखों से वहाँ रास्ता बंजर  सा लगा 

रोज ख़ुशियों की बेहिसाब अर्ज़ियाँ लेकर  
अब तो मंदिर का रास्ता मुझे दफ़्तर सा लगा 

उसकी हर बात में कुछ ऐसी बात होती है 
फ़लक भी सामने उसके मुझे कमतर सा लगा 

घर में समझौते-ख़्वाहिशें रहीं तसल्ली से 
आज के दौर में हर शख्स दरबदर सा लगा 

उसकी बातों से मुझे ऐसे तजुर्बात हुए  
उसका चुप रहना किसी बोझ का लश्कर सा लगा 

Friday, March 02, 2012

ज़िन्दगी तुझको बसर कुछ इस तरह करते रहे 
रात दिन दुश्मन से जैसे हम सुलह करते रहे 

आईना चुपचाप अपना फैसला करता रहा
हम वकीलों की तरह खुद से जिरह करते रहे

इस तकलुफ्फ़ की वजह भी कोई तो होगी ज़रूर
याद वो आख़िर हमें क्यों बेवजह करते रहे

शाम होते ही उसे सबने भुला डाला यहाँ
वो जो सूरज की तरह घर घर सुबह करते रहे

जब तलक वो जिंदगी की जंग में शामिल रहा
मोर्चे दुश्वार थे लेकिन फ़तह करते रहे .....डॉ.उर्मिलेश 

Monday, January 02, 2012

ग़ज़ल

मेरी लिखी हुई गिनी चुनी ग़ज़लों में से एक ग़ज़ल


हाल में ही आम आदमी के सरोकारों को अपनी कलम से आवाज देने वाले शायर 'अदम गोंडवी ' के निधन के पश्चात फिर से वही सरकारी मदद और पुरस्कारों की घोषणाओं का नाटकीय शोर सुनाई  देने लगा ..........


ठीक ऐसे ही कालजयी उपन्यास ' राग दरवारी' के रचनाकार श्री लाल शुक्ल को एक प्रतिष्ठित पुरस्कार तब दिया गया जब उनके लिए पुरस्कार के कोई मायने ही नहीं थे .............


ऐसे ही ना जाने कितने सम्मानित विभूतियों  को ऐसी स्तिथि में सम्मान की औपचरिकता के निर्वहन का एक हिस्सा तब बनाया जाता है जब उनकी उम्र अपना पड़ाव तय कर चुकी होती है ........... 


आखिर जीवन के अंतिम पलों  में या मृत्यु उपरांत दिए जाने वाले पुरस्कारों का क्या औचित्य है ?ये  प्रश्न हम आम जन के दिमाग में ना जाने कितनी बार कौंधता है जब न्यूज पेपर ,समाचार हमें बताते हैं कि अमुक सम्मान अमुक को .......


माना कि कलाकार या साहित्यकार के सृजन को पुरस्कारों की दरकार नहीं होती फिर भी कला का सम्मान करना यानि अपनी संस्कृति का सम्मान करना है फिर वो सम्मान उस समय क्यों नहीं जब कलाकार उस सम्मान के  ओज और उत्साह से  अपने कृतित्व को और रवानी दे सके  ..............


यही सब सोचते सोचते ये  दो लाइन अपने मोबाइल के नोट बुक पर लिखीं थीं .......अब कद्र -रहमतें  क्यों भला / जो चला गया वो चला गया ...............कल जब नींद ने मोहलत दे दी थोड़ी देर जागने की तो सोचा इस शेर के साथ पूरी ग़ज़ल को ही मुकम्मल करूँ कुछ और पहलुओं के साथ  ............


जो लिखा नहीं वो पढ़ा गया 
जो कहा नहीं वो सुना गया 

उसे सब अमीर -ऐ -दिल कहें 
वो जो शख्स आँसू छुपा गया 

अब कद्र ,रहमतें क्यूँ भला 
जो चला गया ,वो चला गया 

हम दायरों में ही खुश रहे 
हमें खुशमिज़ाज कहा गया 


सुबह ख़्वाब लगते हैं अजनबी 
हमें नींद में भी छला गया 

जिसे दुःख कभी ना रुला सके 
उसे पल खुशी का रुला गया 

हर रास्ते का मुकाम है 
हर मात पे ये कहा गया


Tuesday, December 20, 2011

ग़ज़ल


खुद को कैसे सोचें अब
हर लम्हे तुमसे  हों जब

हाथ मिलाएं उनसे क्यूँ
दिल में शक शुबहे हों जब

उस दिन की उम्मीद में हैं
सपनीली सुबहे हों जब

ख़ुद में यकीं ज़रूरी  है
पथरीली राहें हों जब

कैसे प्यार के गीत लिखें
जीवन में आहें हों जब