शब्द समर्पण
एक महीने पहले फेसबुक पर ख़ुद को एक और नए ग्रुप में जुड़ा हुआ पाया .....नाम था 'फरगुदिया ...स्त्री के अंतर्मन में उठे प्रश्न और समाधान ' नाम थोड़ा अलग सा था .....मैंने ग्रुप का पेज ओपन किया फिर उसके बनाये जाने के मकसद पर मेरा ध्यान गया .......मुझे पता चला कि ये ग्रुप दिल्ली की रहने वाली एक साधारण सी ग्रहणी जिनका नाम 'शोभा मिश्रा 'है , उनका है जिन्होंने अपनी बचपन की मित्र जिसका नाम 'फरगुदिया 'था उसकी याद में बनाया है...... मात्र १४ वर्ष की उम्र की थी फरगुदिया जब वह किसी की दरिंदगी का शिकार हुई और जब गरीब, बेसहारा और एक गाँव में घरों में काम-काज कर अपने परिवार का पालन-पोषण करने वाली उसकी माँ ने उसका गर्भपात करवाया तो उसकी मौत हो गई.............संवेदनाओं को समर्पित इस ग्रुप से और शोभा दीदी से लगाव कुछ बढ़ गया था ...फोन से भी बातचीत होने लगी इस बीच एक कर्यक्रम के लिए उनका फोन मेरे पास आया ...उनका मन था कि उसी फरगुदिया और उसकी जैसी हज़ारों-लाखों-करोड़ों फरगुदियाओं की याद में एक शाम रखी जाये जिसमें कुछ कवयित्रियाँ इस तरह की कुकृत्यों के विरोध में अपनी कविताओं का पाठ करें ...मैंने हामी तो भर दी लेकिन मन में कई बार ये प्रश्न भी आया कि सिर्फ़ कवितायेँ या सिर्फ़ एक मौखिक क्रांति से समाज में कुछ बदलाव आ पायेगा ?
फिर सोचा मानवीय संवेदनाओं के निम्नतर स्तर की उपज हैं ये घटनाएँ ......और इन्हें उच्चतर बनने की क्रिया एक सतत प्रक्रिया है ...........इसके लिए प्रयास होता रहे चाहे वो लिखने और पढ़ने से ही क्यों ना हो ..तो लगा ये ज्यादा अच्छा है .... कुछ ना होने से बहुत बेहतर ...........
ख़ैर कार्यक्रम हुआ और सफल भी हुआ ....... 'फरागुदिया के नाम-एक शाम' कहने के लिए 'फरगुदिया' के नाम पर एक कविता पाठ का कार्यक्रम था. लेकिन कविताओं के अलावा वहाँ बहुत कुछ और भी था जिसने उपस्थित श्रोताओं के मन को छुआ. सबसे पहले दीप-प्रज्वलन एक ऐसी महिला से जिनका ज़िक्र हाशिए में भी नहीं होता. घरों में काम-काज कर अपने सात बच्चों के परिवार का पालन-पोषण और अपनी बच्चियों को अच्छी शिक्षा देने का सपना रखने वाली विधवा अनारा देवी ने कार्यक्रम अध्यक्षा सविता सिंह जी और मुख्य अतिथि सुमन केशरी जी के साथ दीप प्रज्वलन किया...कैसर जैसी घातक बीमारी को अपनी जिजीविषा से परास्त कर बहुत सारे लोगों के लिए उम्मीद की किरण बनीं मंजु दीक्षित जी का सम्मान .......वरिष्ठ साहित्यकार नन्द भारद्वाज जी ,पुरुषोत्तम अग्रवाल जी एवं हरीश नवल जी की गरिमा पूर्ण उपस्तिथि ने कार्यक्रम को और गरिमा प्रदान की वरिष्ठ कवयित्रियों सविता सिंह जी , सुमन केसरी जी , स्नेह सुधा नवल जी के साथ साथ लीना मल्होत्रा राव , अंजू शर्मा , , विपिन चौधरी , रश्मि भारद्वाज , निरुपमा सिंह , स्वाति ठाकुर के काव्य पाठ ने कार्यक्रम एक सार्थक आयाम दिया ....... कवि और समाज सेवी प्रेम भारद्वाज जी ,डॉ गीता सिंह भी कार्यक्रम में मौजूद थे | मुकेश मानस जी , भरत तिवारी जी , राघवेन्द्र अवस्थी जी , रविन्द्र के दास जी , स्वतंत्र भारत , सुबोध कुमार जी , रूपा सिंह , स्नेह देसाई , धीरज कुमार , नरेन्द्र कुमार , रोहित कुमार , भास्कर ठाकुर , सुशील , महेश दीक्षित जी , मंजू दीक्षित जी , चंद्रकांता , सखी समूह की सह संचालिका अरुणा सक्सेना भी माजूद थीं ...................सईद अयूब ने कार्यक्रम सफल बनाने में शोभा जी की पूरी मदद की ....
एक नया अनुभव था मेरे लिए ...एक तो फेसबुक के बहुत सारे मित्रों से फेस टू फेस मिलना और दूसरा एक ऐसे कार्यक्रम में जाना जो संवेदनाओं की उपज है ................कार्यक्रम की कुछ झलकियाँ इन पिक्चर्स में ......
मेरी सुनाई हुई दो कविताओं में से एक कविता जो 'फरगुदिया' को और उस जैसी ही अनेकों बच्चियों को समर्पित है
तुमने ले ही लिया था
तुमने ले ही लिया था
जन्म
कि तुम्हे लेना था
लोरियाँ ,थपकियाँ नहीं थीं
तुम्हरे लिए
मगर तुम थी तो छोटी सी
बच्ची ही ना
सो ही जाती थीं पैरों
,हाथों ,को पेट से लगा के
बढ़ने लगी थीं तुम
कि तुम्हे बढ़ना ही था
रोटियां बस खाने को नहीं
थीं तुम्हारे लिए
दिन भर के काम का मेहनताना
था तुम्हारा
जो ईधन देता रहे तुम्हारी
अंतडियों को
तुम रजस्वला हो गयी थीं
कि तुम्हे होना ही था
अब तुम कुम्हार की चाकी पर
चढ़ ही गयी थीं
पकने कि लिए
तुम्हारे उभरते बदलाव चमकने
लगे थे निगाहों में बहुतों के
अचानक तुम तोड़ दी गयीं
लेकिन तुम्हे टूटना नहीं था
कच्चे गीले बर्तन से भी कोई
पानी पी गया
और चाक से गिर कर तुम बिखर
गयीं ऐसे चक्रव्यूह में
जिसे भेदना तुमने भी सीखा
ना था .....
तुम्हे बहुत कुछ होना था
मगर तुम हो ना पायीं
तुम पवित्र थीं गिरजे के
घंटे की मुंदरी की तरह
हैवानियत ने छुआ तुम्हे
तुम बजीं भी मगर एक चीख की
तरह,
महकना था तुम्हे सुगंध की
तरह
तुम बिखर गयीं भस्म की तरह,
खेलना था तुम्हे बच्चों की
तरह
मगर तुम खेली गयीं खिलौनों
की तरह,
तुम्हे कहना था बहुत कुछ
मगर तुम कह ना पायीं
‘बच्ची’ से ‘स्त्री’ बनने
तक
तुम हो ही जातीं
तीखी ,कसैली ,पैनी
इस समाज की बदौलत
आक्रोश का लावा धधकता रहा होगा तुम्हारे अंदर तब तक
जब तक तुम्हारी चिता की
सुलगती लकड़ियों ने उसे ठंडा ना कर दिया होगा
क्या अग्नि ही काट थी
तुम्हारी अग्नि की ?








